साँप और कबूतर
नीति कथा

साँप और कबूतर

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हरे-भरे एक जंगल में एक बूढ़ा साँप रहता था। उम्र के साथ वह इतना कमज़ोर हो चुका था कि शिकार करना उसके बस की बात नहीं रही थी। एक दिन जंगल की ज़मीन पर धीरे-धीरे रेंगते हुए भूख उसके पेट में ऐंठन पैदा कर रही थी। हताश और निराश होकर उसने सोचा — “अगर जल्दी कुछ खाने को नहीं मिला, तो मैं ज़रूर मर जाऊँगा।”

तभी उसकी नज़र एक पेड़ के पास दाना चुगते कबूतरों के झुंड पर पड़ी। उसके दिमाग़ में एक तरकीब कौंधी — “शायद मुझे शिकार करने की ज़रूरत ही नहीं। इन पक्षियों को बहला लूँ तो काम बन जाएगा।”

साँप धीरे-धीरे कबूतरों की ओर सरकने लगा। उसे देखते ही कबूतर घबराकर पंख फड़फड़ाने लगे।

“डरो मत! उड़कर मत जाओ!” साँप ने थकी और काँपती आवाज़ में पुकारा।

कोको नाम का एक बहादुर कबूतर सँभलकर आगे आया — “हम क्यों न डरें? तुम साँप हो! तुम हम जैसे पक्षियों को खाते हो।”

साँप और कबूतर — चित्र 1

साँप ने अपना सिर ज़मीन पर टिका दिया और एक लंबी आह भरी — “अरे प्यारे पक्षियो, अब मैं वह साँप नहीं रहा। मुझे देखो! बूढ़ा और कमज़ोर हो चुका हूँ। न पेड़ पर चढ़ सकता हूँ, न शिकार कर सकता हूँ। मैं तो बस जीने के लिए कोई काम ढूँढ़ रहा हूँ।”

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