घने जंगल के एक कोने में, एक आरामदेह-सी माँद में खरगोशों का परिवार रहता था। माँद के बाहर उन्होंने नारंगी गाजरों की क़तारें उगा रखी थीं, जो धूप में चमकती रहतीं। परिवार में थे — पापा खरगोश, मम्मी खरगोश और उनका नन्हा बेटा, जिसे दुनिया देखने का बड़ा चाव था। माता-पिता कितना भी समझाएँ, उसका मन तो दूर-दूर तक घूमने को ही करता।
पापा खरगोश ने कहा —
"बेटा, बिना बताए कहीं मत निकल जाया करो! बाहर बहुत ख़तरे हैं।"
मम्मी खरगोश ने कहा —
"अपने पापा की बात मानो, नन्हे। जंगल बहुत बड़ा है, तुम आसानी से रास्ता भटक सकते हो।"
नन्हा सिर हिला देता, पर उसकी जिज्ञासा हर बार उसकी समझदारी से जीत जाती।
एक सुहानी सुबह, जब माता-पिता गहरी नींद में थे, नन्हे खरगोश ने चुपके से फाटक की कुंडी खोली और बाहर कूद पड़ा। सूरज चमक रहा था और रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में नाच रही थीं।
नन्हा खरगोश ने कहा —
"वाह! कितनी सुंदर तितलियाँ हैं! पता नहीं ये कहाँ जा रही हैं…"
